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मिथिला के महान गायत्री साधक ‘‘महात्मा पुरूषोत्तम ठाकुर’’ का संक्षिप्त जीवन परिचय

जीवन परिचय

महात्मा जी का जन्म लगभग 1918 ई0 में बिहार के मधुबनी जिला के सौराठ ग्राम में एक ब्राम्हण परिवार में हुआ। इनके पिता का नाम स्व0 रविनाथ ठाकुर एवं माता का नाम राजेश्वरी देवी था। महात्मा जी बाल्यकाल से ही तेजस्वी थे। इनकी शिक्षा-दीक्षा संस्कृत माध्यम से हुई एवं इन्होने मध्यमा तक पढ़ाई किया पर इनका मन पढ़ाई से ज्यादा अध्यात्म की तरफ था। लगभग 16 वर्ष की उम्र से इन्होने ‘‘माॅं गायत्री’’ की साधना प्रारंभ की। धीरे-धीरे इनकी तपस्या कठोर होती गई। ये सूर्योदय से सूर्यास्त तक तपस्या में लीन रहने लगे। इनकी तपस्या की मुद्रा एक पैर पर खड़े हो माॅ गायत्री की जप साधना थी। कुछ समय पश्चात इन्होने अन्न का भी त्याग कर दिया एवं फल, कंद-मुल खाकर ही साधना में रत रहे। जीविकोपार्जन का कोई साधन न था अतः प्रारंभिक समय कष्टों से भरा था परंतु माॅ गायत्री की कृपा से इनकी साधना चलती रही। महात्मा जी गृहस्थ आश्रम को सर्वश्रेष्ठ मानते थे। लगभग 21 वर्ष में इनका विवाह ‘उर्मिला देवी’ से हुआ। इनकी पत्नी ने प्रारंभ से अंत तक इनकी तपस्या में सहयोग किया। इनसे तीन संतान हुए दो पुत्र एवं एक पुत्री। महात्मा जी के बड़े भाई ‘लक्ष्मीनारायण ठाकुर’ जो स्वंय तपस्वी थे ने इनकी तपस्या में पुर्ण सहयोग किया एवं इस बात का ध्यान रखा कि महात्मा जी की तपस्या में कोइ विघ्न ना हो। महात्मा जी के धर्म-गुरू स्व0 धर्मनाथ झा ने भी इनकी तपस्या में सहयोग किया। धीरे-धीरे इनकी साधना गुढ़ और कठिन होती गई और इसी क्रम में इन्होने 12 वर्ष का क्षेत्रन्यास किया अर्थात 12 वर्षों तक अपने निवास स्थान पर ही रहे, कहीं आना जाना नहीं। इनका कहना था कि आप जिस भी ईश्वर की साधना करते हैं उन्हें ढुंढने कहीं जाने की जरूरत नहीं है, वह आप में ही है सिर्फ तपस्या एवं सेवाभाव से आप उन तक पहुंच सकते हैं। महात्मा जी ने कभी ये दावा नहीं किया कि मेरे पास अमुक सिद्धियां है, पर जिस प्रकार फुल खिलने पर उसकी सुगंध नहीं छुपती उसी प्रकार इनकी ख्याति दुर-दुर तक होने लगी। मिथिलांचल के अनेक क्षेत्रों से लोग इनके दर्शन हेतु पधारने लगे, सैकड़ों लोगों ने इनसे दीक्षा ली और इन्होने हमेशा अपने शिष्यों का मार्गदर्शन किया। अपने उम्र के उत्तरार्ध में इन्होने अपने घर पर ही मां गायत्री के मूर्ति की स्थापना किया एवं अगले वर्ष गायत्री महायज्ञ का अयोजन किया। महात्मा जी की अंतिम ईच्छा यही थी कि जिस प्रकार मेरे जीते जी कोई भी मेरे घर से भुखा न गया उसी प्रकार मेरे शरीर त्याग के बाद भी यह प्रक्रिया जारी रहे। महात्मा जी की मृत्यु 2006 ई0 में हुई एवं इनकी मृत्यु के पश्चात् इनके संकल्प को इनके बड़े पुत्र ने आगे बढ़ाया एवं ‘माता गायत्री’ के ‘भव्य मंदिर निर्माण’ के संकल्प को पुरा करने में जुटे हुऐ हैं। मैने अभी बहुत ही संक्षिप्त में महात्मा जी के बारे में जानकारी दी है, आगे इनके बारे में और भी जानकारी शेयर करूंगा।

गायत्री मंदिर

मिथिला के ऐतिहासिक स्थल ‘सौराठ सभागाछी’ से लगभग 200 मी0 पुर्व में ‘माॅं गायत्री’ का एक मंदिर स्थित है। इस मंदिर में माॅं गायत्री की स्थापना 1 मई 1996 ई0 को महात्मा जी के द्वारा की गई। वर्ष 1997 ई में मई महीने में 19 तारीख से 27 तारीख तक ‘गायत्री महायज्ञ’ का आयोजन महात्मा जी के द्वारा किया गया। तब से लेकर आज तक नियमित रूप से माॅ गायत्री की पूजा-अर्चना जारी है।